Saturday, 4 October 2014

पतझड़ का वो गिरता पत्ता.......

पतझड़ का वो गिरता पत्ता
समेटे  था  अपने  भीतर अनगिनत दस्ताने
स्मृति  पटल पर  देख  रहा  था
गुजरे पलों की गाथाएँ

याद  आ  रहा  था  वो  क्षण  उसको
जिस  क्षण  उसका  सृजन  हुआ
हरा -भरा  सा  रंग  था उसका
अनेकों संभावनाएं  समेटा  हुआ

नई  उम्मीद  थी,नया  सफर था
नया  जोश  था  उसमे भरा
नयी  सोंच संग प्रकृति  की
गोद में  पलता रहा

माघ की कपकपाती ठंड भी झेली थी  उसने
जेठ  की गर्मी  में भी था तपा
संघर्ष  ने जब व्याकुल किया था
सावन  की ओट में था जा छुपा

उन दिनों को याद करके
आज था वो उदास सा

हरा रंग पीला हुआ
अब हो चुका था भूरा
नन्ही कोपल का नवजात शिशु
अब हो चूका था बूढा

यू तो गिर रहा था ज़मीन पर
फ़िर भी एक अज़ीब सी चमक थी उसकी आँखो में
शायद कहना चाह रहा था :
नन्ही कोपल फिर जन्मेगी

अबकी बार......   मेरी  साँसों  में.......
     अबकी बार......   मेरी  साँसों  में.......

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